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Saturday, 11 December 2010

Vridhavastha (वृद्धावस्था) : साहित्य एवं विज्ञान की दृष्टि में

"देखी मैंने आज जरा !
हो जावेगी क्या ऐसी ही मेरी यशोधरा ?
हाय ! मिलेगा मिट्टी में वह वर्ण-सुवर्ण खरा ? सूख जायेगा मेरा उपवन, जो है आज हरा ?
सौ सौ रोग खडे हों सम्मुख पशु ज्यों बाँध परा ।"
- यशोधरा, मैथिलीशरण गुप्त


वृद्धावस्था : साहित्य एवं विज्ञान की दृष्टि में
        सिद्धार्थ की ये पंक्तियाँ वृद्धावस्था या बुढापे की हकीकत बयान करती हैं और फिर सिद्धार्थ की ही बात क्यों करें। मनुष्य ने जब से होश संभाला है वह बुढापे की भयावहता, बेबसी, लाचारी, अपरिहार्यता को भुगतता रहा है और उसे वह एक अपरिवर्तनीय नियति के रूप में स्वीकारता रहा है। यह बात अलग है कि वह लगातार बुढापे की चुनौती को स्वीकार कर उससे निजात पाने की कोशिश करता रहा है। उसके भीतर छिपा �ययाति� सदैव युवा रहने के लिए अकुलाता रहता है, यह जानते हुए भी कि बुढापा प्राणिमात्र की नियति है। युवा दिखने के लिए कई जतन किये जाते हैं, प्रसाधन सामग्री काम में ली जाती है। पर, बुढापा तो बुढापा है, छिपता कहाँ है। बहरहाल बुढापा रुकता कहाँ है, एक बार आ जाने पर जाता कहाँ है। बकौल एक शायर के-
जन्दगी आनी-जानी देखी
जाके न आने वाली जवानी देखी
आके न जाने वाला बुढापा देखा ।
क्योंकि बुढापा प्राणिमात्र की अपरिहार्य स्थिति है इसलिए इसका जिक्र न केवल हमारी रोजमर्रा की जन्दगी में आयेगा, अपितु शास्त्रों में, साहित्य में, कविता में क्यों नहीं आयेगा। शंकराचार्य का ��भजगोविन्दम्�� स्त्रोत बुढापे की वास्तविकता को कहता है -


अंगं गलितं पलितं मुण्डम, 
दशनविहीनं जातं तुण्डम्। 
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, 
तदपि न मुंचत्याशा पिण्डम्।।


अंग्रेजी कवि शेक्सपियर के नाटक �एज यू लाइक इट� में मनुष्य की सात स्थितियों का वर्णन है। सातवीं स्थिति �बुढापे� को इस प्रकार विवेचित किया गया है -


Last scene of all,
That ends this strange eventful history Is second childishness and mere oblivion Sans teeth, Sans eyes, Sans taste, Sans everything

इसके पहले की अवस्थायें हैं - शिशु, स्कूली बालक, प्रेमी, सैनिक, न्यायमूर्ति। एक अन्य कविता में शेक्सपियर बुढापे को जवानी की तुलना में हेय मानता हुआ कहता है-


(A Madrigal)
Crabbed Age and Youth
Cannot live together
Youth is full of pleasure,
Age is full of care,
Youth like a summer morn,
Age like winter weather,
Youth like summer brave,
Age like winter bare,
Youth is full of sport,
Age's breath is short,
Youth is nimble, Age is lame,
Youth is hot and bold,
Age is weak and cold,
Youth is wild, and Age is tame
Age, I do abhor thee, Youth, I do adore thee;

अंग्रेजी कवि कॉलरिज युवावस्था की ऊर्जा का स्मरण कर बुढापे को कोसता है -


This breathing house not built with hands, 
This body that does me grievous wrong,
O'er aery cliffs and glittering sands,
How lightly then it flashed along :
..... Nought cared this body or wind or weather When youth and I lived in't together
...Ere I was old ? Ah, woeful Ere, which tells me, youth is no longer here !

W.B. ल्मंजे एक बूढे व्यक्ति का वर्णन इस प्रकार करते -


An aged man is but a paltry thing,
A tattered coat upon a stick, unless
Soul clap its hands and sing, and louder sing For every tatter in its mortal dress.
(Sailing to Byzantium)

एक अन्य अंग्रेजी कवि जॉन मैसफील्ड बुढापे की विवशता की बात इस प्रकार करते हैं -

Be, with me, Beauty, for the fire is dying: My dog and I are old, too old for roving,
Man, whose young passion sets the spindrift flying, Is soon too lame to march, too cold for loving.
(On growing old)

वृद्धावस्था के सम्बन्ध में इस प्रकार के असंख्य उदाहरण विश्व के समस्त वाङ्मय से जुटाये जा सकते हैं। क्योंकि बुढापा प्राणिमात्र के जीवन से अविच्छिन्न रूप से जुडा हुआ एक चरण है इसलिए युवावस्था से वृद्धावस्था का परिवर्तन सर्वत्र चर्चित रहा है। लेकिन एक बार जरूर है, बुढापा कितना भी बुरा क्यों न हो, विश्व की प्रायः सभी जातियों में वृद्ध लोगों का सदैव सम्मान रहा है। हो सकता है कि यह बात मनुष्य के सामूहिक अवचेतन ;बवससमबजपअम नदबवदेबपवनेद्ध का एक हिस्सा रही है जहाँ अक्लमंद बुजुर्ग ;ूपेम वसकउंदद्ध का आद्यरूप ;ंतबीम जलचमद्ध उसके स्वभाव और व्यवहार का एक स्वमेव अंग बन गया है। यही कारण है कि सर्वत्र बुजुर्ग दादा-दादी, माता-पिता, नाना-नानी आदि के परामर्श को सर्वत्र महत्त्व दिया जाता है। यह बात केवल अपने देश में ही नहीं है, संसार की सभी जातियों में यह बात पाई जाती है। कभी कोई मुसीबत आई, बुजुर्गों की राय माँगी जाती है, बुजुर्ग अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर उनकी मुसीबत को हल करने की यथा संभव कोशिश करते हैं। यह बात अलग है कि अब कहीं-कहीं बुजुर्गों की उपेक्षा होने लगी है, उनकी राय गैरजरूरी समझी जाती है। यह युग की विडम्बना है। फिर भी अधिकांश देशों में बुजुर्गों को उचित सम्मान मिलता है और उनके दीर्घ अनुभव और सामयिक राय की कद्र की जाती है। हमारे देश की आचार संहिता में कहा गया है -


अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशोबलम् ।।
वह सभा व्यर्थ है जहाँ वृद्ध न हों -
��न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः ।��

ज्मददलेवद की एक कविता में भ्वउम जीमल ठतवनहीज ीमत ॅंततपवत क्मंक आता है कि जब एक सैनिक का शव उसके घर लाया जाता है तो उसकी पत्नी पाषाणवत् जड और मूक हो जाती है, वह न रोती है और न चिल्लाती है। सभी यत्न करने पर भी उसकी जडता नहीं टूटती। सभी चिन्तित होकर कहते हैं कि उसे रोना चाहिए अन्यथा वह मार जायेगी। तभी -


Rose a nurse of ninety years,
Set his child upon her knee -
Like summer tempest came her tears - 'Sweet my child, I live for thee'.

नब्बे वर्ष की एक दाई की भूमिका कितनी कारगर सिद्ध हुई, यह देखने की बात है। वृद्धावस्था को कितना भी क्यों न कोसें, उसकी अपनी शान है। पुनः टैनीसन के शब्द -


Old age hath yet his honour and his toil, 
Death closes all; 
but something ere the end, 
Some work of noble note,
 may yet be done.
(Ulysses)


बहरहाल, वृद्धावस्था के संदर्भ में मैंने जो बातें अब तक कहीं वह किसी पाण्डित्य-प्रदर्शन के लिए नहीं कही हैं, अपितु संदर्भ को अधिकाधिक रोचक एवं व्यापक बनाने की दृष्टि से यह सब कुछ कहा गया है। अन्यथा, वृद्धावस्था की मजबूरी और वृद्धों का सम्मान वाली बात तो एक पंक्ति में कही जा सकती है। हो सकता है तब वृद्धावस्था के जैसा रूखापन इस सारे विवेचन को अग्राह्य बना देता। क्योंकि वृद्धावस्था का संदर्भ अत्यन्त व्यापक है इसलिए उसके संबंध में बहुत कुछ कहने की गुंजाइश है। इस कारण मैं कतिपय बिन्दुओं को चर्चा के केन्द्र में ला रहा हूँ। मसलन, वृद्धावस्था क्या है ? हम बूढे क्यों होते हैं, क्या उम्र को लम्बा किया जा सकता है ? बुढापे का स्वागत हम कैसे करें ? बुढापे को कैसे जिएँ। इस प्रकार के अन्य बिन्दु भी चर्चा के दौरान आ सकते हैं। बुढापे की तात्त्विक व्याख्या के साथ-साथ यह भी प्रासंगिक हो सकता है कि आज के भौतिकता प्रधान युग में बूढे लोगों की जो स्थिति है,उनके बाद की पीढी के परिजन उनके प्रति कैसा रवैया अपना रहे हैं, क्या बूढों को उनके हाल पर ही छोड दिया जाये या कोई सामाजिक सांस्कृतिक हल निकल सकता है जिसके माध्यम से वृद्ध लोगों को उचित सम्मान मिले और उनके परिजनों को स्नेहिल सान्निध्य में उनका बुढापा चैन से कटे ? यह सही है कि आज का समस्त परिदृश्य अत्यन्त उलझा हुआ है, समाधान आसान नहीं दिखता; तथापि यदि सोच में सकारात्मक बदलाव आ सके तो निश्चित ही वृद्धावस्था असह्य नहीं रहेगी। यहाँ यह कहना बहुत जरूरी है कि निश्चित ही वृद्ध जनों से अभिप्राय केवल नगरों में रहने वाले सुविधा सम्पन्न लोगों से नहीं है, अपितु गाँवों में रहने वाले असंख्य शिक्षित- अशिक्षित, गरीब-अमीर सभी लोग वृद्ध जनों के दायरे में आते हैं या उन्हें आना चाहिए। इसलिए वृद्धावस्था की चर्चा में ऐसे लोगों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। होता यह है कि हम प्रायः शहरों में रहने वालों वृद्धों के बारे में ही सोचकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं, गाँवों में बसे वृद्धों की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। आखिर, वृद्धावस्था गाँव और शहर में कोई फर्क तो नहीं करती। वृद्धावस्था की जो समस्यायें शहरों में है उसी तरह की समस्यायें गाँवों में भी हो सकती है। बहरहाल, अब विचार करें कि वृद्धावस्था क्या है ? इस प्रश्न पर हँसा जा सकता है क्योंकि हम सभी जानते हैं कि बुढापा आता है तो आता है, उसको परिभाषित करने की क्या जरूरत है। वृद्धावस्था या बुढापा क्या है ? यह प्रश्न उठाने का अभिप्राय यह है कि वे क्या लक्षण हैं जिनसे लगने लगता है कि बुढापा आने लगा है या आ गया है।


हम सब बूढे होते हैं, बुढापे का अनुभव करते हैं पर हम प्रायः इस बात पर विचार नहीं करते कि हम सामान्य बुढापा किसे कहते हैं। इस प्रश्न का उत्तर विभिन्न वैज्ञानिक अपने अपने ढंग से करते हैं, पर कुछ ऐसे लक्षण हैं जिनको देखकर यह मालूम हो जाता है कि बुढापा हम पर आ रहा है। कई लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि यदि मन बूढा न हो तो बुढापा नहीं आता। पर यह तो मन को बहलाने वाली बात है। शरीर में होने वाले परिवर्तनों से हम कैसे आँखें मूँद सकते हैं। वैसे जन्दगी जीने का यह भी एक अंदाज है। यह बात भी अपनी जगह बिल्कुल सही है कि यदि हम बुढापे का अहसास न कर सदैव अपने को जवान दिल रखें तो बुढापे की त्रासदी का असर हम पर कम पडेगा। फिर भी कुछ ऐसी सामान्य बातें हैं जिनसे यह निश्चित होने लगता है कि जवानी हमारा साथ छोड रही है और हम बुढापे की तरफ बढ रहे हैं। मसलन, उम्र बढने के साथ-साथ हृदय थोडा बडा हो जाता है, फेफडों की श्वसन क्षमता में लगभग ४० प्रतिशत की कमी आने लगती है। मस्तिष्क में कुछ कोशिकाएँ (न्यूरौंस) में कमी आने लगती है और दूसरी नष्ट हो जाती है, गुर्दे धीरे-धीरे अपनी कार्य क्षमता खोने लगते हैं, वे रक्त की अशुद्धियों को नहीं निकाल पाते तथा मूत्राशय की क्षमता भी गिरने लगती है। शरीर में वसा इकट्ठी होने लगती है। स्त्रियों में यह वसा नितम्बों और जाँघों में इकट्ठी होती है, पुरुषों में वसा के कारण तोंद निकल आती है। तीस साल के बाद यदि हम व्यायाम न करें तो हमारी तेईस प्रतिशत माँसपेशियाँ समाप्त होने लगती हैं। नेत्र दृष्टि में चालीस के बाद गिरावट आने लगती है और हम निकट की चीजों को ठीक से देखने में परेशानी महसूस करने लगते हैं। सत्तर की उम्र तक पहुँचते ही हमें वस्तुओं की बारीकियाँ दिखाई नहीं देतीं। बुढापे में सुनने की क्षमता कम होने लगती है, पुरुषों में स्त्रियों की अपेक्षा यह क्षमता ज्यादा गिरती है। तीस की उम्र के बाद शरीर के स्वभाव में कोई खास तब्दीली नहीं आती। कभी-कभी इस प्रकार की तब्दीली रोग का कारण बनती है।
बूढे क्यों होते हैं हम ? - यद्यपि यह हमें ज्ञात है कि बुढापा एक अपरिहार्य स्थिति है, तथापि हमारे वैज्ञानिक यह जानने के लिए कि हम बूढे क्यों होते हैं और बुढापा देर से कैसे आये ? लगातार शोध कार्य में लगे हुए हैं। उनके द्वारा किये जा रहे शोध कार्यों के परिणाम भी अच्छे निकले हैं। बुढापे के रहस्य की गुत्थी भी धीरे-धीरे खुलती जा रही है और बुढापे की गति को धीमा करने के उपाय भी हमारे हाथ लगे हैं। यदि वैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग करें तो कहना होगा कि जब हमारी कोशिकाओं में डी.एन.ए. (डी ऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड) की अतिरिक्त मात्रा इकट्ठी हो जाती है, तो यह मात्रा ऐसे स्तर तक पहुँच जाती है जिससे कोशिका का सामान्य कार्य अवरुद्ध हो जाता है। इसके फलस्वरूप हम धीरे-धीरे बूढे होते चले जाते हैं। एक शोध के अनुसार बुढापा आने का कारण यह है कि जब कोशिकाओं में क्रोमोसोमो (गुणसूत्रों) के सिरों को बाँधने वाले डी.एन.ए. के छोटे-छोटे टुकडे, जिन्हें टेलीमीयर्स कहा जाता है, हर बार कोशिकाओं के विभाजित होने के साथ-साथ सिकुडने लगते हैं, कोशिका विभाजित होना बन्द कर देती है, वह शिथिल होकर निर्जीव हो जाती है। संसार में प्रत्येक कोशिका जैव विज्ञानी टेलीमीयर्स के बारे में शोध में लगा हुआ है और बूढे होने की प्रक्रिया में इसकी क्या भूमिका है, यह पता लगाने की कोशिश में है।


यहाँ पर लियोनार्ड हेफ्लिक द्वारा प्रवर्तित सिद्धान्त �हेफ्लिक लिमिट थियेरी� का जिक्र करना गैरमुनासिब न होगा। इस सिद्धान्त के अनुसार एक जैव घडी (बाइलॉजिकल क्लॉक) होती है। कोशिकाएँ अपने को एक निश्चित अवधि तक विभाजित करती है, तत्पश्चात् वे निष्प्राण हो जाती हैं। इस श्रेणी में टेलीमीयर्स ठीक बैठते हैं। पर्यावरण या चूक सिद्धान्त (एन्वायरमेंट या एरर थियेरी) बुढापे का कारण समय द्वारा की जा रही क्षति को प्रतिपादित करते हैं। जैसे- जैसे हम बूढे होते जाते हैं, डी.एन.ए. क्षतिग्रस्त होता जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि जैनेटिक (जननिक) प्रोग्राम गडबडा जाता है और हम में बुढापे के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
इसी क्रम में एक और सिद्धान्त सामने आया है। इसे फ्री रैडीकल थियेरी (मुक्तमूलक सिद्धान्त) के नाम से जाना जाता है। इसका प्रतिपादन १९५६ में नेब्रास्का विश्वविद्यालय के डेन्हम हर्मन ने किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार बूढे होने की प्रक्रिया में �फ्री रेडीकल्स� की सीधी भागीदारी होती है। श्वसन के उप-उत्पाद के रूप में ये फ्री-रेडीकल्स उस समय पैदा होते हैं जब कोशिकाएँ भोजन और ऑक्सीजन को ऊर्जा में बदल देती है। फ्री-रेडीकल्स काफी नुकसान पहुँचाते हैं। ये हमारी कोशिकाओं, धमनियों, जोडों, त्वचा यहाँ तक कि जींस कोड डी.एन.ए. को तहस नहस कर देते हैं। यह टूट-फूट इतनी तीव्र गति से होती है कि शरीर में इसकी क्षतिपूर्ति जल्दी नहीं हो पाती। जितने भी भयंकर रोग - मधुमेह, दमा, मोतियाबिन्द, अल्सर (व्रण), हृदय रोग, कैंसर अस्थिक्षय (रियूमाटाइड आर्थराइटिस) होते हैं उनके पीछे ऑक्सीजन के फ्री रेडीकल्स का हाथ होता है। इन्हें एन्टी ऑक्सीडेंट भी कहा जाता है। ये इतने बहुसंख्यक, हिंसक और व्यापक होते हैं कि शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को बर्बाद कर देते हैं। शरीर के भीतर होने वाली इस विनाश लीला में अत्यधिक तनाव जीवन शैली, तनाव प्रदूषण आदि कई अन्य घातक घटक अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं।


स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि हम ज्यों-ज्यों बूढे होते जाते हैं क्षतिपूर्ति और भीतरी मरम्मत का काम शिथिल होता जाता है। शरीर में फ्री रैडीकल्स पैदा होकर हमारी कोशिकाओं में प्रोटीन को कमजोर बना देते हैं। यह क्षति इतनी इकट्ठी हो जाती है कि उसके फलस्वरूप अवयवी निष्प्राण होकर अलग जा गिरता है। बूढे होने के बारे में एक सिद्धान्त हार्मोन से भी जुडा हुआ है। जैसे ही हम पर बुढापा आता है कुछ ग्रंथियाँ शिथिल हो जाती हैं जिसका परिणाम यह होता है कि हमारे भीतर एस्ट्रोजन, टेस्टास्टेटोन, ग्रोथ हार्मोन और थायराइड हार्मोन की मात्रा कम होती जाती है। चयापचय (मैटाबौलिज्म) की क्रिया शिथिल हो जाती है और शरीर क्षतिपूर्ति करने में अपने को असमर्थ पाता है।


इन सिद्धान्तों से बुढापे के रहस्य को समझने में कुछ न कुछ मदद अवश्य मिलती है, पर हम बूढे क्यों होते हैं, यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है। वैज्ञानिकों के द्वारा इस दिशा में खोज जारी है, पर अभी भी पूर्ण रूप से स्वीकार्य उत्तर की हमें प्रतीक्षा है। कुल मिलाकर दो तरह के निष्कर्ष हमारे सामने हैं, एक तो यह है कि हमारे शरीर में एक निश्चित प्रोग्राम है। मानो कि जैसे कोई जैव घडी हो जैसे ही यह घडी शुरू होती है हम बूढे हो जाते हैं। दूसरा निष्कर्ष यह है कि हमारा बुढापा पर्यावरण सम्बन्धी घटकों का परिणाम है। जो भी हो, बूढे होने की बात अभी तक एक पहेली ही है।


सवाल लम्बी उम्र का - बुढापा एक मामले में तन-मन के क्षय का ही एक रूप है। बूढे होने पर हमारी जीवनावधि कम होने लगती है। जीवनावधि से जुडा हुआ एक रोचक तथ्य यह है कि हमारी वास्तविक जीवनावधि कितनी होनी चाहिए। एक मोटा सा फार्मूला यह है कि जीवनावधि को जानने के लिए हमें अपने शरीर पंजर को परिपक्व होने में जितना समय लगता है, उस अवधि को पाँच गुना करके यह बात समझी जा सकती है। मनुष्य का पंजर पच्चीस साल की उम्र तक परिपक्व होता है। इस हिसाब से हमारी जीवनावधि १२० साल से लेकर १२५ साल तक होती है। जीवन संभावना का अर्थ है कि आफ जीने की कब तक संभावना है। इसे लाइफ एक्सपैक्टेंसी कहा जाता है। अब सवाल यह है कि क्या मनुष्य की जीवनावधि बढाई जा सकती है ? अब वर्तमान शोधों के आधार पर यह निष्कर्ष निकला है कि मनुष्य की जीवनावधि सम्यक आहार, व्यायाम, पोषण और हार्मोन पूर्ति से बढाई जा सकती है। इन चीजों से हमारी सक्रियता भी बरकरार रह सकती है और हम एक सार्थक और कर्मशील जीवन जी सकते हैं।


दीर्घ जीवन का मार्ग - जीवनावधि को बढाने के सभी उपायों का वर्णन हमारी प्राचीन मनीषा में मिलता है। हमारे विभिन्न आरोग्य शास्त्र, योग आदि जीवनावधि को बढाने की रीति-नीति के शास्त्र ही तो हैं। हाँ, इतना जरूर है कि हम इस ज्ञान को विस्मृत किये हुए हैं और नई विज्ञान खोजों का मुँह ताक रहे हैं। अब बात आहार की ही लें। क्या �युक्ताहार� की बात हमारे यहाँ नहीं कही गयी है। यह बात अब अलग है कि आज के वैज्ञानिक यह सिद्ध कर रहे हैं कि वे लोग ज्यादा दिन जन्दा रहते हैं जो औरों की अपेक्षा भोजन की कम कैलोरी का उपयोग करते हैं। उनका कहना है कि विल्काबम्बा के दक्षिणी अमरीकी, मध्य योरोप की काकेशियन्स और हिमालय क्षेत्र की डूंजा जाति के लोग सभी प्रतिकूल परिस्थितियों में रहते हैं, कडी मेहनत करते हैं, कम कैलोरी का स्वास्थ्यवर्द्धक (१६००) कैलोरी भोजन करते हैं। जापान में एक जगह है ओकीनावा जहाँ एक के बाद एक शतायु लोग मिलेंगे। सारी दुनिया में जापान में सबसे अधिक दीर्घ जीवी लोग रहते हैं। इसका कारण है कि उनका भोजन कम कैलोरी का होता है किन्तु पोषण तत्त्वों से भरपूर होता है। पिछले दिनों हुई शोधों के आधार पर ज्ञात हुआ कि यदि कैलोरी नियंत्रित रहे तो केलोस्ट्रोल की मात्रा संयमित रहती है और हृदय रोगों का खतरा नहीं रहता। रक्त में �ट्राईग्लिसराईडीज� में कमी होती है और रक्त चाप भी निश्चित सीमा में रहता है। कैलोरी नियंत्रण से डी.एच.ई. (स्वस्थ जीवन के लिए एक हार्मोन) की मात्रा के घटने की गति धीमी रहती है। एक मोटा सिद्धान्त यह है कि �कम खाओ, लम्बी उम्र पाओ।� यह सिद्धान्त वैज्ञानिक आधार पर भी तर्कसंगत है। कैलोरी की मात्रा कम करने से चयापचय की क्रिया धीमी हो जाती है। क्योंकि मुक्त मूलक (फ्री रेडिकल्स) चयापचय के उप-उत्पाद हैं। कैलोरी नियंत्रण द्वारा उनके द्वारा की जाने वाली विनाश लीला में कमी आती है और फिर कैलोरी नियंत्रण से शरीर का तापक्रम भी थोडा कम रहता है। इसलिए कोशिकाओं की क्षति भी कम होती है। प्रयोगों के निष्कर्ष के आधार पर यह तथ्य सामने आया कि कैलोरी नियंत्रण से न केवल जीवनावधि में वृद्धि हो सकती है अपितु रोगों की प्रक्रिया में भी इसके कारण धीमापन आता है। इन शोधों से यह आशा बँधती है कि कैलोरी नियंत्रण के सिद्धान्त से बुढापे में होने वाले रोगों के कारणों का पता लगाने में भी सहायता मिलेगी। आजकल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विभिन्न शारीरिक व्यायामों की अनुशंसा की जाती है। इनसे जीवनावधि में वृद्धि होती है, पर इनकी अपनी सीमायें हैं। देखा यह गया है कि शरीर के इन व्यायामों की प्रकृति �कैटाबॉलिक� है यानी इनसे शरीर के तंतु टूटते हैं और शक्ति-क्षय होता है। पर एक प्रक्रिया योगाभ्यास की समग्र प्रक्रिया है जिसमें एनाबॉलिक प्रक्रिया के द्वारा हम शक्ति अर्जित करते हैं और हमारे तंतुओं में भी टूट-फूट बहुत कम होती है। साथ ही तन-मन का तालमेल योगाभ्यास में कहीं बेहतर ढंग से होता है। इसलिए लम्बी उम्र और सम्पूर्ण स्वस्थ जीवन के लिए योगाभ्यास ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। योगमय जीवन के द्वारा ही हम बुढापे को पछाड सकते हैं।


यहाँ पर मैं योगमय जीवन शैली की बात एक विशेष उद्देश्य से उठा रहा हूँ। मेरा ऐसा विश्वास है कि यही जीवन शैली हमारे बुढापे के पहले और बुढापे के बाद हमारा साथ एक अच्छे विश्वासपात्र मित्र की तरह निभा सकता है। अनुभव ने यह भी सिखाया है कि इसके नियमित अभ्यास से बुढापा देर से आता है, हम निरोग एवं स्वस्थ रहते हैं, दोनों प्रकार से तन और मन से। सतत अभ्यास से हमारा जीवन दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है, हम प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने की क्षमता अर्जित करते हैं, हम कार्यकुशल, संवेदनशील, मैत्री, करुणा, मुदिता के भावों से भरे रहते हैं और एक बेहतर इंसान बनते हैं।


यह देखा गया है कि बुढापे में विवशता, मजबूरी, लाचारी का भाव प्रायः मन में घर कर जाता है, जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ हताश पैदा करने लगती हैं, जन्दगी नीरस और निरर्थक लगने लगती है। परिणामतः हमारा सोच नकारात्मक होने लगता है। हममें सनक, चिडचिडापन, अवसाद, असहिष्णुता आदि दुष्प्रवृत्तियाँ पनपने लगती हैं। इसलिए जरूरी है कि हम इस जीवन शैली को अपना कर शुरू से ही अपने को सुदृढ बना लें, तन और मन से। और बुढापे का स्वागत हजारों मुस्कानों से करें। जीवन को सतत कर्मक्षेत्र मानते हुए क्रियाशील रहें, अपने को अहर्निश व्यस्त रखें और बार-बार राबर्ट ब्राउनिंग की ये पंक्तियाँ दोहराते रहें और लोकमंगल के कार्यों में लगे रहें -


'Grow old along with me
The best is yet to be'

कभी भी निराशा को पास न फटकने दें। जन्दगी मुश्किलों का नाम है, संघर्षों की परिभाषा है इसलिए जन्दगी की हर चुनौती को ऐसे स्वीकार करें -


Come my friends,
"It is not too late to seek a new world,
.... Though much is taken, much abides though We are not now that strength which in old days Moved earth and heaven, that we are, we are: One equal temper of heroic hearts,
Made weak by time and fate, but strong in will To strive, to seek, to find, and not to yield.
(Tennyson, Ulysses)

प्रत्येक बूढे व्यक्ति में कार्य का उत्साह बरकरार रहना चाहिए। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का जीवन हमारा आदर्श हो सकता है। राबर्ट फ्रॉस्ट की कविता की पंक्ति ष्प् ींअम उपसमे जव हव इमवितम प् ेसममचष् से प्रेरणा लेने वाले नेहरू जी जब बासठ वर्ष के हो गये उस समय लिखी गई हिन्दी के प्रसिद्ध कवि शिव मंगल सिंह �सुमन� की ये पंक्तियाँ उदाहरण योग्य हैं -


अभी हमारे राष्ट्रमुक्ति के सपने
पथ पर पडे अधूरे
और मुक्तिदाता तुम अपने
बासठ साल कर चुके पूरे
तुम बूढे हो चले, जवानी
जिस पर होती रही निछावर
तुम बूढे हो चले, राष्ट्र की
धडकन जिन साँसों पर निर्भर
तुम बूढे जिनके कंधों पर
चालीस कोटि जनों की आशा
तुम बूढे तो हमें बदलनी
होगी यौवन की परिभाषा ।

बुढापे के दौर से गुजरते हुए क्या हम नहीं चाहेंगे कि हमारे बारे में भी ये पंक्तियाँ सही चरितार्थ हों। जन्दगी की सार्थकता उम्र के पैमाने से नहीं नापी जानी चाहिए, हमारा किरदार कैसा रहा है, यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं -


It is not growing like a tree
In bulk, doth make Man better be;
Or standing long an oak, three hundred year, To fall a log at last, dry, bald and sere:
A lily of a day
Is fairer far in May,
Although it fall and die that night
It was the plant and flower of light.
- Ben Jonson

ऐसे किरदार को खूबसूरती से निभाने के लिए जरूरी है कि हम बुढापे की परवाह न करें और जहाँ तक सम्भव हो अपनी आदत्त भूमिका को पूर्ण मनोयोग से पूरी करें।

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Nidhi Verma said...

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